राजा भोज की कहानी

सरस्वती के वरदपुत्र विभिन्न विषयों पर 85 स्तरीय पुस्तकों के रचयिता परमार वंशीय सम्राट विक्रमादित्य की ११ वीं पीढ़ी में महाराज भोज का जन्म हुआ। जब सिंधुलराजपुत्र राजकुमार भोज 5 वर्ष के थे और पाठशाला में अध्ययन कर रहे थे तब एक बार एक ज्योतिषी उनके दरबार में आया। युवा महाराज मुञ्ज (यह भी विद्वान् लेखक था तथा इनके समय में भी *'दशरूपककार'* धनिक-धनञ्जय जैसे कई विद्वान् हो गए हैं और स्वयं भी अनेक ग्रंथ लिखे) ने उस ज्योतिषी से कहा कि मेरे भतीजे का भविष्य बताएँ। ज्योतिषी ने कहा मेरे सामने बालक को लाया जाए। राजाज्ञा से भोज को तुरंत पाठशाला से लाया गया।
       राजकुमार भोज की मस्तक की रेखाएँ देखते ही ज्योतिषी ने भविष्यवाणी कर दी-
*"पञ्चाशत् पञ्च वर्षाणि सप्तमास दिनत्रयम्।*
*भोजराजेन भोक्तव्यो सगौडो दक्षिणापथः।।"*
अर्थात् भोज 55 वर्ष 7 महीना 3 दिन तक गौड देश से दक्षिणापथ तक यानी संपूर्ण अखंड भारत में एक छत्र राज्य करेंगे।
       यह सुनकर राजा ने उस ज्योतिषी को समुचित दक्षिणा देकर विदा कर दिया। कृत्रिम प्रसन्नता का अभिनय करते हुई क्षुब्ध मन की म्लानता को छिपा लिया। चिन्ता इस बात की हो गई कि ऐसा होने पर तो राजसत्ता मेरे हाथ से निश्चित ही चली जाएगी। राजसत्ता मुंज के हाथ से भोज के पास चली जाएगी इस दुःख से दुःखी होकर राजा मुंज ने एक योजना बनाई जिससे *"न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी"*
उसने बंगाल के वत्सराज (सेनापति)को बुलाकर गोपनीय आदेश दिया कि रातों रात में भुवनेश्वरी के जंगल में ले जाकर भोज का वध कर दो और बातों बात यह खबर किसी के कानमें न जाए ।
       वत्सराज भोजराज को अँधेरी रात में भुवनेश्वरी के षुनसान घनघोर जंगल में ले जाकर वध करने के लिए तलवार निकाल लेता है । कल्पना करो आप या कोई अन्य उन परिस्थितियों में होता तो उसकी क्या दशा होती, वह तो अभी 5 वर्ष का बालक है किंतु यह भारत की वर्ण व्यवस्था जिसमें रक्तशुद्धता का आनुवंशिक प्रभाव जन्मजात था। कर्ण को भले ही पता नहीं था किंतु वंश परंपरा से प्राप्त गुण ,उसमें थे जिन्हे बाद में परशुराम जी ने पहचान लिया था ।
      तो यह बालक घबराया नहीं । वत्सराज ने बता दिया कि महाराज ने तुम्हारे वध का आदेश दिया है और मैं उसी राजाज्ञा का पालन करने के लिए तुम्हे यहाँ लाया हूँ। तेजस्वी बालक ने कहा तो राजाज्ञा का पालन करो और वह ध्यान लगाकर बलि का बकरा बनने के लिए पद्मासन पर बैठ गया।
      सेनापति ने कहा कि कुमार तुम कोई अंतिम संदेश तो नहीं कहना चाहते हो ? तो उसने जवाब दिया कि यदि आप इतना अवसर देंगे तो अवश्य मैं अंतिम संदेश देना चाहूँगा।
      वत्सराज ने कहा बताओ ।उसने कहा लिखकर देता हूँ और अपनी जाँघ चीरकर रक्त से एक बड़ के पत्ते पर चार पंक्तियों का एक श्लोक लिखकर सेनापति को दिया। 
    श्लोक पढ़कर उसकी तेजस्विता के आगे सेनापति नतमस्तक हो गया और वध नहीं किया बल्कि उसको सुरक्षित स्थान में छिपा दिया और उसी तरह का एक कृत्रिम रक्तरंजित शिर बनवाकर वत्सराज महाराज मुंज के पास पहुँच गया ।यह देखिए महाराज !आपकी आज्ञा का पालन हो गया ।राजा को प्रेम तो था ही । कटा हुआ सिर देखकर बहुत दुःखी हुआ।
      रोते हुए सेनापति से पूछा कि तलवार से प्रहार करते समय क्या बेटे ने कुछ कहा तो नहीं था? अवसर समझकर वत्सराज ने कहा कि हाँ महाराज ! बालक ने एक पत्र आपके लिए मेरे द्वारा भिजवाया है जो उसने मृत्यु से पूर्व लिखा था औरह कहकर वह पत्र राजा को सौंप देता है। राजा ने उस पत्र में लिखा हुआ उक्तांकित श्लोक पढ़ा। 
 *"मान्धाता च महीपतिः कृतयुगालंकारभूतो गतः।*
*सेतुर्येन महोदधौ विरचितः क्वासौ दशास्यान्तकः।।*
*अन्ये चापि युधिष्ठिरप्रभृतयः याता दिवं भूपतेः*।
*नैकेनापि समं गता वसुमती नूनं त्वया यास्यति।।"*
           भावार्थ यह है कि---
सतयुग में पृथ्वी के अलंकार के समान संपूर्ण पृथ्वी पर शासन करने वाले महान् प्रतापी राजा मान्धाता भी चले गए।
(सभी युगों के प्रतिनिधि एक-एक राजा का नाम लिखा)
महासागर पर सेतु बाँधने और दशानन रावण का वध करने वाले राम भी आज कहाँ हैं अर्थात् वे भी चले गए।
और अन्य युधिष्ठिर आदि राजा लोग भी आए और चले गए।
(किंतु) *यह पृथ्वी किसी के साथ भी नहीं गई, लगता है नूनं(निश्चय ही) तेरे साथ जाएगी। तभी तो तू ऐसा महापाप कर रहा है ,इस पृथ्वी के लिए (यानी यह भी समझ गया कि उसका वध किस उद्देश्य से किया जा रहा है।*
यह पढ़कर राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसे अपनी जिंदगी से विरक्ति हो गयी। उसे पता चला कि कोई सिद्ध तांत्रिक आया है जो विषहत, सर्पहत, शस्त्रहतादि को पुनर्जीवित करने की क्षमता रखता है। राजा ने उसे बुलाया और कहा कि शस्त्रहत मेरे बेटे को पुनर्जीवित कर दो तो मैं तुम्हे मुह मागा पारिषोषिक दूँगा। उसने सामग्री मँगवाई और श्मशानघाट पर तंत्ररसाधना करने के नाम पर गया ।
       कुछ देर बाद सूचना आई कि तांत्रिक ने राजकुमार भोज को पुनर्जीवित कर दिया है। राजसम्मान के साथ हाथी पर बिठाकर गाजे-बाजे के साथ राजकुमार भोज को श्मशाऩघाट से राजमहल (धारानगरी में स्थित ,यह मध्य प्रदेश में है) तक लाया गया । चाचा मुंज को वैराज्ञ हो गया और वह भोज का राजतिलक करके तप करने के लिए वन चला गया ।
लेकिन आज समय बदल गया है। कुछ अपने आपको ज्ञानवान कहने वाले लोग छोटे मोटे पदों के लिए आजकल अपने ही लोगों से दगाबाजी करने से नहीं हिचकिचाते। राजभोज के चाचा विद्वान थे, श्लोक का अर्थ समझकर उन्हे अपनी भूल का अहसास हुआ लेकिन इस युग में लगता है कुछ लोग पद साथ लेकर ही जायेंगे और यमराज के सामने अपने पद की लिस्ट रखकर उनसे वहाँ भी पद ले ही लेंगे।

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